भूमिका: संकट में समाधान या मनोरंजन?इतिहास जब भी कोरोना काल का मूल्यांकन करेगा, तो वह केवल वायरस और मौतों की बात नहीं करेगा, बल्कि वह उन अजीबोगरीब ‘नुस्खों’ की भी बात करेगा जो सत्ता के शीर्ष से जनता को दिए गए थे। जब एक राष्ट्र के पास अस्पतालों में बेड नहीं थे, जब डॉक्टरों के पास पीपीई (PPE) किट नहीं थी और जब मजदूर सड़कों पर नंगे पैर चल रहे थे, तब देश को ‘थाली बजाने’ और ‘दीये जलाने’ के आयोजनों में व्यस्त रखा गया। यह अध्याय विश्लेषण करता है कि कैसे एक गंभीर स्वास्थ्य संकट को एक ‘जनसंपर्क अभियान’ (PR Exercise) में बदल दिया गया।मनोवैज्ञानिक खेल और जिम्मेदारी से पलायन:थाली बजवाना और ताली पिटवाना—शुरुआत में इसे स्वास्थ्य कर्मियों के प्रति ‘आभार’ प्रकट करने का जरिया बताया गया। सुनने में यह एक अच्छा मनोवैज्ञानिक कदम लग सकता था, लेकिन हकीकत में यह सरकार की अपनी विफलताओं को ढंकने का एक तरीका था। जब जनता शोर मचाने में व्यस्त हो गई, तो किसी ने यह सवाल नहीं पूछा कि “साहब, डॉक्टरों को मास्क कब मिलेंगे?” या “अस्पतालों में वेंटिलेटर की संख्या कितनी बढ़ी?” भावना को विज्ञान के ऊपर हावी कर दिया गया। राष्ट्रवाद की चाशनी में लपेटकर जनता को यह यकीन दिला दिया गया कि शोर मचाने से वायरस भाग जाएगा।दीपावली का भ्रम और अंधविश्वास को बढ़ावा:एक तरफ वैज्ञानिक वैक्सीन खोजने में दिन-रात एक कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ पूरे देश की लाइटें बंद करवाकर दीये और मोमबत्तियां जलवाई गईं। कुछ अति-उत्साही समर्थकों ने तो यहाँ तक दावा कर दिया कि दीये की रोशनी से निकलने वाली ‘ऊर्जा’ कोरोना वायरस को खत्म कर देगी। सरकार ने इन अंधविश्वासों का खंडन करने के बजाय इन्हें मौन समर्थन दिया। यह एक आधुनिक, शिक्षित समाज के लिए बहुत ही शर्मनाक स्थिति थी, जहाँ हम वैज्ञानिक चेतना (Scientific Temper) को छोड़कर मध्यकालीन टोटकों की ओर लौट रहे थे।इवेंट मैनेजमेंट की राजनीति:राजनीति में ‘इवेंट’ बहुत जरूरी होता है क्योंकि यह जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटका देता है। कोरोना काल में हर सात दिन में एक नया संबोधन और एक नया ‘टास्क’ दिया गया। जनता को एक ऐसी स्थिति में रखा गया जहाँ उसे लगे कि वह भी इस लड़ाई का हिस्सा है, जबकि असल में वह केवल एक तमाशबीन (Spectator) बनकर रह गई थी। जब लोग ऑक्सीजन की कमी से मर रहे थे, तब भी बड़े-बड़े विज्ञापनों में ‘महाविजय’ का जश्न मनाया जा रहा था। क्या यह क्रूरता की पराकाष्ठा नहीं थी?असली योद्धाओं का अपमान:जिन स्वास्थ्य कर्मियों (डॉक्टरों और नर्सों) के सम्मान में ताली बजवाई गई, उन्हीं पर जब हमला हुआ या जब उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए आवाज उठाई, तो सरकार ने उन्हें जेल भेजने की धमकी दी। कई नर्सों को समय पर वेतन नहीं मिला, सफाई कर्मचारियों को बिना सुरक्षा उपकरणों के कचरा उठाने पर मजबूर किया गया। ताली की गूंज तो पूरी दुनिया ने सुनी, लेकिन उन योद्धाओं की सिसकियां किसी ने नहीं सुनी जो बिना खाए-पिये 18-18 घंटे पीपीई किट में पसीने से लथपथ होकर काम कर रहे थे।निष्कर्ष: नारों से पेट नहीं भरताकोरोना काल ने हमें सिखाया कि जब मुसीबत आती है, तो न ताली काम आती है और न ही थाली। काम आता है तो केवल एक मजबूत ‘पब्लिक हेल्थ सिस्टम’। सरकार की जिम्मेदारी जनता को ‘टास्क’ देना नहीं, बल्कि उन्हें ‘सुरक्षा’ देना है। यह अध्याय हमें चेतावनी देता है कि भविष्य में जब भी कोई संकट आए, तो हम इवेंट के बजाय ‘इंफ्रास्ट्रक्चर’ पर सवाल पूछें। क्योंकि अंधेरे में दीये जलाने से बाहर का अंधेरा तो दूर हो सकता है, लेकिन उस अंधेरे का क्या जो अस्पताल की उन सूनी गलियों में था जहाँ दवाइयों की कमी थी?
