अध्याय 57: आपदा में अवसर—कोरोना काल का काला सच और राजनीतिक क्रूरता

​भूमिका: श्मशान की आग और सत्ता की चमकसाल 2020 और 2021 भारत के इतिहास के वे काले पन्ने हैं जिन्हें कोई याद नहीं करना चाहता, लेकिन एक लेखक के तौर पर हमें उन्हें दर्ज करना होगा ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि जब जनता मर रही थी, तब उनके ‘जनप्रतिनिधि’ क्या कर रहे थे। कोरोना काल केवल एक स्वास्थ्य संकट नहीं था, बल्कि यह हमारी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था के पूरी तरह ढह जाने का जीता-जागता सबूत था। जहाँ एक तरफ लोग ऑक्सीजन के एक सिलेंडर के लिए अपनी जमापूंजी लुटा रहे थे, वहीं दूसरी तरफ सत्ता के गलियारों में ‘आपदा में अवसर’ तलाशा जा रहा था।​पलायन का दर्द: सड़कों पर दम तोड़ता भारतजब बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक लॉकडाउन लगा दिया गया, तो करोड़ों मजदूर रातों-रात बेघर और बेसहारा हो गए। सरकार ने हवाई जहाजों से विदेशों में फंसे अमीरों को तो वापस बुला लिया, लेकिन अपने ही देश के उन मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया जिन्होंने शहरों की ऊंची इमारतें बनाई थीं। तपती धूप में हजारों किलोमीटर पैदल चलते बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्गों की तस्वीरें आज भी रूह कंपा देती हैं। राजनीति इस पर भी हुई—बसें भेजने के नाम पर राज्यों के बीच खींचतान चलती रही, जबकि मजदूर रेलवे की पटरियों पर कट कर मर रहे थे। क्या यह हमारे लोकतंत्र के लिए शर्म की बात नहीं थी?​ऑक्सीजन की कालाबाजारी और ‘सांसों’ का सौदाकोरोना की दूसरी लहर के दौरान भारत ने वह मंजर देखा जो किसी युद्ध में भी नहीं देखा जाता। अस्पतालों के बाहर लोग तड़प-तड़प कर मर रहे थे क्योंकि ऑक्सीजन नहीं थी। लेकिन हैरानी की बात यह है कि उसी समय बाजारों में ऑक्सीजन सिलेंडर और ‘रेमडेसिविर’ जैसे इंजेक्शन लाखों रुपये में बिक रहे थे। यह कालाबाजारी बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं थी। जब अदालतों ने सरकारों से सवाल पूछे, तो जवाब देने के बजाय आंकड़ों को छिपाया गया। गंगा में तैरती लाशें और रेत में दबे शव चीख-चीख कर कह रहे थे कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था आईसीयू (ICU) पर है, लेकिन सरकारी विज्ञापनों में सब कुछ ‘ऑल इज वेल’ बताया जा रहा था।​आंकड़ों की बाजीगरी और मौतों का छिपानाराजनीति का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आया जब मौतों के आंकड़े कम दिखाने की होड़ लग गई। अस्पतालों को निर्देश दिए गए कि ‘कोरोना’ के बजाय ‘पुरानी बीमारी’ को मौत का कारण लिखा जाए। श्मशानों के बाहर लगी लंबी कतारें सरकारी आंकड़ों को झुठला रही थीं। यह आंकड़ों की चोरी इसलिए की गई ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार की छवि खराब न हो। लेकिन क्या उन परिवारों के दर्द का कोई हिसाब है जिन्होंने अपनों को खोया और उन्हें सरकारी रिकॉर्ड में जगह तक नहीं मिली? मुआवजे के नाम पर भी राजनीति हुई और आज भी हजारों परिवार उस मदद के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।​वैक्सीन की राजनीति और विज्ञापन का खेलवैक्सीन (टीकाकरण) जो कि जनता का हक था, उसे एक ‘राजनीतिक उपहार’ की तरह पेश किया गया। वैक्सीन के सर्टिफिकेट पर फोटो से लेकर होर्डिंग्स तक, हर जगह प्रचार की भूख दिखाई दी। विपक्षी दलों ने वैक्सीन पर सवाल उठाए और सत्ता पक्ष ने इसे अपनी महान उपलब्धि बताया। इस खींचतान के बीच जनता भ्रमित होती रही। जब दुनिया के बाकी देश अपने नागरिकों को मुफ्त और तेजी से टीका लगा रहे थे, हमारे यहाँ वैक्सीन की कमी और उसके दामों को लेकर राज्यों और केंद्र के बीच नूराकुश्ती चल रही थी।​पीएम केयर्स फंड और पारदर्शिता का सवालसंकट के समय जनता ने अपनी गाढ़ी कमाई से ‘पीएम केयर्स फंड’ में दान दिया। लेकिन जब इस फंड के ऑडिट और खर्च की जानकारी मांगी गई, तो उसे ‘सार्वजनिक’ करने से मना कर दिया गया। वेंटिलेटर खरीदे गए लेकिन वे कई अस्पतालों में खराब पाए गए। जनता का पैसा कहाँ गया और कैसे खर्च हुआ, यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में संकट के समय खर्च किए गए पैसे का हिसाब देना सरकार की जिम्मेदारी होती है, लेकिन यहाँ ‘गोपनीयता’ की चादर ओढ़ ली गई।​निष्कर्ष: क्या हमने कुछ सीखा?कोरोना काल ने यह साबित कर दिया कि चुनाव जीतने की मशीन बन चुकी पार्टियां मानवीय संवेदनाओं से कितनी दूर जा चुकी हैं। नेताओं की रैलियां और कुंभ जैसे आयोजनों ने आग में घी का काम किया, लेकिन जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। अगर उस समय राजनीति को किनारे रखकर केवल स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान दिया जाता, तो शायद लाखों जानें बचाई जा सकती थीं। यह अध्याय हमें याद दिलाता रहेगा कि अगली बार जब हम वोट दें, तो मंदिर-मस्जिद या जाति के बजाय ‘अस्पताल’ और ‘ऑक्सीजन’ के बारे में जरूर सोचें।

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