अध्याय 1: बेरोजगारी का महासागर और डिग्रियों की रद्दीभूमिका:
सपनों का श्मशानभारत एक युवा देश है, लेकिन आज यही युवा शक्ति हताशा के दौर से गुजर रही है। जब एक नौजवान अपनी पढ़ाई पूरी करके कॉलेज से बाहर निकलता है, तो उसके हाथ में डिग्री तो होती है, लेकिन भविष्य धुंधला होता है। बेरोजगारी केवल एक आंकड़ा नहीं है; यह एक बाप की उम्मीदों का टूटना है, एक माँ के आंसुओं की बेबसी है और एक युवा के स्वाभिमान की हत्या है। हम इस अध्याय में विस्तार से समझेंगे कि कैसे हमारी व्यवस्था ने युवाओं को ‘पकोड़े तलने’ या ‘मजदूरी करने’ पर मजबूर कर दिया है।शिक्षित बेरोजगारी और स्किल का अभाव:हमारे देश की शिक्षा प्रणाली और उद्योगों की जरूरत के बीच एक बहुत बड़ी खाई है। कॉलेज केवल डिग्रियां बांटने वाली मशीनें बन गए हैं। छात्र इतिहास की तारीखें और रटे-रटाए फॉर्मूले तो जानते हैं, लेकिन जब वे दफ्तर या कारखाने में जाते हैं, तो उन्हें काम का व्यवहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) नहीं होता। सरकारें स्किल इंडिया जैसे अभियान तो चलाती हैं, लेकिन उनका स्तर इतना गिर चुका है कि वहां से मिलने वाले सर्टिफिकेट्स की बाजार में कोई कीमत नहीं है। परिणाम यह होता है कि बी.टेक और एम.बी.ए. किए हुए छात्र चपरासी या सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिए लाइन में खड़े मिलते हैं।सरकारी नौकरियों का मायाजाल और राजनीति:आज के युवा के लिए सरकारी नौकरी एक सुरक्षा कवच की तरह है, लेकिन इसे पाना अब एक असंभव सपना बनता जा रहा है। सरकारें चुनाव से पहले लाखों नौकरियों का विज्ञापन निकालती हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वे भर्तियां ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। कभी पेपर लीक हो जाता है, कभी आरक्षण का मुद्दा फंसता है, तो कभी मामला कोर्ट की ‘तारीख पर तारीख’ में उलझ जाता है। एक भर्ती को पूरा होने में 5-5 साल लग जाते हैं। इस बीच युवा की उम्र निकल जाती है और वह कहीं का नहीं रहता। नेताओं के लिए ये भर्तियां केवल वोट बटोरने का जरिया हैं, युवाओं का भविष्य नहीं।प्राइवेट सेक्टर का शोषण और असुरक्षा:प्राइवेट नौकरियों में ‘हायर एंड फायर’ (जब चाहो रखो, जब चाहो निकालो) की नीति चलती है। 12-12 घंटे काम कराने के बाद भी वेतन इतना कम होता है कि एक व्यक्ति अपना घर भी ढंग से नहीं चला सकता। न कोई पेंशन है, न कोई स्वास्थ्य बीमा। कोरोना जैसी महामारी ने दिखा दिया कि कैसे प्राइवेट कंपनियां संकट के समय अपने कर्मचारियों को लावारिस छोड़ देती हैं। युवाओं के पास कोई विकल्प नहीं बचता, इसलिए वे इस शोषण को सहने के लिए मजबूर हैं।ग्रामीण बेरोजगारी और पलायन:गाँवों में खेती अब घाटे का सौदा बन गई है। गाँव का युवा अब खेत में काम नहीं करना चाहता क्योंकि वहां सम्मान और पैसा दोनों कम है। रोजगार की तलाश में वह शहरों की ओर पलायन करता है, जहाँ वह झुग्गियों में रहकर अमानवीय परिस्थितियों में काम करता है। इस पलायन ने गाँवों को खाली कर दिया है और शहरों पर जनसंख्या का बोझ बढ़ा दिया है। क्या हमारी सरकारें गाँवों में छोटे उद्योग या कुटीर उद्योग स्थापित नहीं कर सकती थीं?मानसिक अवसाद और आत्महत्याएं:बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या नहीं है, यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी घातक है। समाज और परिवार का दबाव एक बेरोजगार युवा को अंदर से तोड़ देता है। जब वह देखता है कि उसके साथ के लोग आगे बढ़ रहे हैं और वह वहीं खड़ा है, तो वह नशे या अपराध की ओर मुड़ जाता है। पिछले कुछ वर्षों में बेरोजगार युवाओं द्वारा की गई आत्महत्याओं के आंकड़े रूह कंपा देने वाले हैं। क्या इसके लिए हमारी व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है?निष्कर्ष और समाधान:बेरोजगारी दूर करने के लिए केवल वादों से काम नहीं चलेगा। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को उद्योगों के अनुसार बदलना होगा। स्वरोजगार के लिए बिना ब्याज के कर्ज और बिना कागजी झंझट के व्यापार शुरू करने की सुविधा देनी होगी। सरकारी भर्तियों को एक निश्चित समय सीमा (Time-bound) के भीतर पूरा करना अनिवार्य करना होगा। जब तक युवा के हाथ में काम और जेब में सम्मानजनक पैसा नहीं होगा, तब तक भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने का सपना अधूरा रहेगा।
अध्याय 2: आधा शतक—व्यवस्था की हार या आम आदमी का सब्र?एक आत्मचिंतन:
आज हम अपनी किताब के 50वें अध्याय पर हैं। हमने स्कूल, अस्पताल, बिजली, पुलिस, और भ्रष्टाचार जैसे अनगिनत मुद्दों पर बात की। इन 50 अध्यायों को लिखते हुए एक बात साफ हो गई है कि देश की समस्या ‘संसाधनों’ की कमी नहीं, बल्कि ‘नीयत’ की कमी है। भारत के पास पैसा है, योजनाएं हैं और तकनीक भी है, लेकिन जो चीज गायब है, वह है आम आदमी के प्रति संवेदनशीलता।बदलते समय में बदलती राजनीति:पुराने समय में राजनीति का उद्देश्य ‘समाज सुधार’ था, लेकिन आज का आधा शतक हमें यह सिखाता है कि राजनीति अब केवल ‘प्रबंधन’ (Management) बन गई है। जनता को कैसे उलझाए रखना है, कैसे असली मुद्दों से ध्यान भटकाकर भावनाओं के खेल में फंसाना है, इसमें आज के नेता माहिर हो चुके हैं। आम आदमी आज भी वही खड़ा है—वही तहसील के चक्कर, वही अस्पताल की लाइनें और वही स्कूल की भारी भरकम फीस।क्या बदला और क्या नहीं?सड़कों पर गाड़ियां बढ़ गईं, हाथ में महंगे मोबाइल आ गए, लेकिन क्या इंसान की सुरक्षा और सम्मान बढ़ा? आज भी एक गरीब को न्याय पाने के लिए अपनी पूरी उम्र और जमापूंजी लगानी पड़ती है। हमने चाँद पर कदम रख दिया, लेकिन हमारे गाँव की नालियां आज भी बजबजा रही हैं। यह विरोधाभास ही आज के भारत की असली तस्वीर है।
अध्याय 4: पुलिस थाना और आम आदमी का डर—क्या पुलिस मित्र है?वर्दी का खौफ बनाम विश्वास:
सरकारी नारों में लिखा होता है “पुलिस आपकी मित्र है”, लेकिन हकीकत में एक आम आदमी थाने के गेट के अंदर कदम रखने से भी डरता है। पुलिस की छवि रक्षक की जगह भक्षक जैसी बन गई है। जब एक पीड़ित व्यक्ति अपनी शिकायत लेकर जाता है, तो उसे न्याय दिलाने के बजाय पहले उससे ऐसे सवाल पूछे जाते हैं जैसे अपराधी वही हो। पुलिस का व्यवहार अक्सर पद और पैसे के हिसाब से बदल जाता है।अमीर के लिए सलाम, गरीब के लिए गाली:थाने में न्याय की तराजू अक्सर नोटों के वजन से झुकती है। अगर आप रसूखदार हैं या किसी नेता की सिफारिश लेकर आए हैं, तो आपके लिए चाय-पानी का इंतजाम होता है और कार्रवाई तुरंत होती है। लेकिन एक गरीब या मजदूर, जो अपनी फरियाद लेकर आता है, उसे घंटों बिठाया जाता है या दुत्कार कर भगा दिया जाता है। एफ.आई.आर. (FIR) दर्ज कराना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है।पुलिस और नेताओं का गठबंधन:पुलिस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह स्वतंत्र नहीं है। वे नेताओं के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली बनकर रह गए हैं। ट्रांसफर और पोस्टिंग के डर से पुलिस अधिकारी सत्ता पक्ष के लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जब तक पुलिस बल को राजनीतिक दबाव से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक ‘रामराज्य’ की कल्पना करना व्यर्थ है।
अध्याय 5: पेंशन के लिए संघर्ष—’साहब, अभी मैं जिंदा हूँ!’बुढ़ापे की लाठी या कागजी खेल:
वृद्धावस्था और विधवा पेंशन उन लोगों के लिए सहारा होती है जिनके पास आय का कोई और जरिया नहीं है। लेकिन यह सहारा पाने के लिए भी बुजुर्गों को अपनी ही मौजूदगी का सबूत देना पड़ता है। तहसील के चक्कर काटते-काटते बुजुर्गों की चप्पलें घिस जाती हैं, पर पेंशन की फाइल आगे नहीं बढ़ती।डिजिटल इंडिया और बेबस बुजुर्ग:आजकल सब कुछ ऑनलाइन और अंगूठे के निशान (Biometric) पर टिका है। लेकिन उम्र के साथ जिनके हाथों की लकीरें मिट गई हैं, उनका अंगूठा मशीन पर नहीं आता। मशीन के न चलने की वजह से महीनों तक उनकी पेंशन रोक दी जाती है। क्या सरकार को नहीं पता कि उस चंद रुपयों की पेंशन से ही किसी गरीब की दवाई या रोटी का जुगाड़ होता है?भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती पेंशन:पेंशन की सूची में ऐसे नाम मिल जाएंगे जो सालों पहले मर चुके हैं, उनकी पेंशन कोई और डकार रहा है। लेकिन जो जिंदा हैं और सच में जरूरतमंद हैं, उन्हें ‘अपात्र’ घोषित कर दिया जाता है। दलाल और कर्मचारी मिलकर उन गरीबों की जेब काट रहे हैं जिनके पास पहले से ही कुछ नहीं है। यह समाज की गिरती नैतिकता का सबसे शर्मनाक उदाहरण है।
अध्याय 6: सफाई और स्वच्छता का ढोंगसिर्फ फोटो तक सीमित स्वच्छता अभियान:
हर शहर और गांव में स्वच्छता अभियान के बैनर लगे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नालियां आज भी बजबजा रही हैं और कूड़े के ढेर सड़कों पर लगे हैं। नेता और अधिकारी झाड़ू लगाकर फोटो खिंचवाते हैं और फिर अपनी चमचमाती गाड़ियों में बैठकर चले जाते हैं। सफाई कर्मचारियों को न समय पर वेतन मिलता है और न ही काम करने के लिए जरूरी सामान।
अध्याय 7: महंगी बिजली और विभाग की मनमानीआम आदमी पर बोझ:
एक समय था जब बिजली का आना एक उत्सव की तरह होता था, लेकिन आज बिजली का आना कम और उसका ‘बिल’ आना ज्यादा चर्चा का विषय रहता है। सरकारें ‘मुफ्त बिजली’ या ‘सस्ती बिजली’ के वादे करके सत्ता में तो आती हैं, लेकिन हकीकत में मीटर की रफ्तार और बिजली की दरें गरीब की कमर तोड़ देती हैं। एक आम मजदूर, जिसके घर में केवल दो पंखे और दो बल्ब जलते हैं, उसका बिल हजारों में आता है, जबकि रसूखदार लोग साठगांठ करके बिजली की चोरी करते हैं।मीटर की बाजीगरी और गलत बिल:आजकल के डिजिटल मीटरों पर जनता का भरोसा कम होता जा रहा है। कई बार मीटर तेज चलते हैं और जब उपभोक्ता इसकी शिकायत करने विभाग जाता है, तो उसे मदद के बजाय अपमानित किया जाता है। “बिल पहले भरो, शिकायत बाद में होगी”—यह विभाग का अघोषित नियम बन चुका है। गलत रीडिंग और फर्जी बिलों को ठीक कराने में ही व्यक्ति के महीनों निकल जाते हैं और उसे दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।लाइनमैन और भ्रष्टाचार का खेल:गांवों और छोटे कस्बों में बिजली विभाग के निचले कर्मचारियों की अपनी ही एक समानांतर सरकार चलती है। ट्रांसफार्मर फुंकने पर उसे बदलवाने के लिए चंदा इकट्ठा करना पड़ता है या सुविधा शुल्क देना पड़ता है। बिजली विभाग के कर्मचारी अक्सर उन लोगों पर तो कार्रवाई करते हैं जो थोड़ा-बहुत बिल नहीं दे पाते, लेकिन बड़े-बड़े कारखानों और रसूखदारों की चोरी पर आंखें मूंद लेते हैं।
अध्याय 8: सड़कों के गड्ढे और भ्रष्टाचार का डामरसड़कों की उम्र और ठेकेदारी का खेल:
भारत में एक कहावत मशहूर है कि “सड़कें चुनाव आने पर बनती हैं और पहली बारिश में बह जाती हैं।” यह कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार का एक सुव्यवस्थित ढांचा है। सड़क बनाने के बजट का एक बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में नेताओं और अधिकारियों की जेब में चला जाता है। जो पैसा बचता है, उससे ऐसी घटिया सड़क बनाई जाती है जो छह महीने भी नहीं टिकती।गड्ढों में सड़क या सड़क में गड्ढे?सड़कों पर बने ये गड्ढे केवल वाहन नहीं तोड़ते, बल्कि कई बार इंसानी जान भी ले लेते हैं। हर साल हजारों लोग खराब सड़कों की वजह से दुर्घटना का शिकार होते हैं। विभाग के पास मरम्मत के लिए बजट तो आता है, लेकिन वह फाइलों में ही खर्च हो जाता है। सड़क पर डामर की इतनी पतली परत चढ़ाई जाती है कि वह धूप और पानी का सामना नहीं कर पाती।
अध्याय 9: सरकारी राशन की दुकान और गरीब का हकराशन कार्ड और कोटेदार की दादागिरी:
सरकार की ओर से भेजा जाने वाला सस्ता अनाज गरीब के पेट की आग बुझाने के लिए होता है। लेकिन राशन की दुकानों (कोटे) पर आज भी भारी धांधली देखने को मिलती है। कभी मशीन नहीं चलती, तो कभी फिंगरप्रिंट मैच नहीं होता। कोटेदार अक्सर गरीब जनता को धमकाता है और उसे कम वजन का अनाज देता है।अनाज की कालाबाजारी:गरीबों के हक का बढ़िया गेहूं और चावल अक्सर बाजार में बेच दिया जाता है और कार्डधारकों को सड़ा हुआ अनाज पकड़ा दिया जाता है। शिकायत करने पर कार्ड कटवाने की धमकी दी जाती है। जब तक राशन वितरण प्रणाली में पारदर्शिता नहीं आएगी और बिचौलियों का अंत नहीं होगा, तब तक कोई भी योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती।
अध्याय 10: पेपर लीक—सपनों की नीलामी और युवाओं का दर्दमेहनत पर पानी:
एक छात्र सालों तक घर से दूर, एक छोटे से कमरे में रहकर, अपनी सुख-सुविधाओं को त्यागकर सरकारी नौकरी की तैयारी करता है। जब परीक्षा का दिन आता है, तो वह पूरी उम्मीद के साथ केंद्र पहुँचता है। लेकिन परीक्षा देकर बाहर निकलते ही खबर मिलती है कि “पेपर लीक हो गया”। यह केवल एक खबर नहीं, उस छात्र के सीने में खंजर की तरह चुभती है जिसने रातों की नींद खराब कर पढ़ाई की थी।शिक्षा माफिया और सिस्टम की मिलीभगत:पेपर लीक होना कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध है। इसमें बड़े-बड़े शिक्षा माफिया, कोचिंग संस्थान और सिस्टम के भीतर बैठे भ्रष्ट अधिकारी शामिल होते हैं। वे चंद रुपयों के लिए उन लाखों बच्चों का भविष्य बेच देते हैं जिनके पास सिफारिश के लिए पैसे नहीं होते। जब पेपर बिकने लगता है, तो योग्यता (Merit) का कोई मोल नहीं रह जाता।तारीख पर तारीख और उम्र का निकलना:एक परीक्षा रद्द होने के बाद दोबारा होने में सालों लग जाते हैं। इस बीच कई युवाओं की उम्र निकल जाती है। सरकारें जांच का आश्वासन देती हैं, लेकिन असली गुनहगार कभी सलाखों के पीछे नहीं पहुँचते। युवा सड़क पर लाठियां खाता है और नेता एसी कमरों में बैठकर इसे “विपक्ष की साजिश” बताते हैं। क्या किसी को उस पिता के दर्द का अंदाजा है जो अपनी जमापूंजी बेटे की पढ़ाई में लगा चुका है?
अध्याय 11: अस्पतालों की ओपीडी और लंबी कतारेंइलाज के लिए संघर्ष:
गरीब आदमी के लिए बीमारी केवल शारीरिक कष्ट नहीं, बल्कि एक आर्थिक आपदा है। जब वह सरकारी अस्पताल पहुँचता है, तो उसे सबसे पहले ‘लंबी कतारों’ का सामना करना पड़ता है। सुबह 4 बजे से लाइन में लगने के बाद भी गारंटी नहीं कि डॉक्टर उसे देख पाएगा।सुविधाओं का अभाव:अस्पताल की दीवारों पर बड़े-बड़े वादे लिखे होते हैं, लेकिन अंदर न मशीनें काम करती हैं और न ही दवाइयां मिलती हैं। ओपीडी के बाहर खड़ा एक मजबूर पिता अपने बीमार बच्चे को गोद में लिए घंटों डॉक्टर का इंतजार करता है। डॉक्टर मिलते भी हैं, तो वे बाहर की महंगी दवाइयां लिख देते हैं। जो मुफ्त इलाज का दावा था, वह कागजों तक ही सीमित रह जाता है।निजी अस्पतालों की चांदी:सरकारी अस्पतालों की इसी बदहाली का फायदा निजी (Private) अस्पताल उठाते हैं। वे मजबूरी का सौदा करते हैं। जब सरकारी अस्पताल में बेड नहीं मिलता, तो गरीब आदमी को कर्ज लेकर निजी अस्पताल जाना पड़ता है, जहाँ उसे तब तक नहीं छोड़ा जाता जब तक उसकी जमीन और जेवर न बिक जाएं। स्वास्थ्य सेवा अब व्यापार बन चुकी है जहाँ “पैसा है तो जीवन है”।
अध्याय 12: गाँव की राजनीति और गुटबाजीगाँव की शांति पर प्रहार:
गाँव कभी भाईचारे के लिए जाने जाते थे, लेकिन चुनाव की राजनीति ने यहाँ भी जहर घोल दिया है। प्रधानी के चुनाव से लेकर जिला पंचायत तक, राजनीति ने घरों और परिवारों को आपस में लड़वा दिया है।विकास की बलि:अगर प्रधान एक गुट का है, तो वह दूसरे गुट की गली में खड़ंजा नहीं लगवाएगा। नालियां आधी अधूरी छोड़ दी जाती हैं क्योंकि वहां “वोट नहीं मिला था”। नफरत की यह राजनीति गाँव के विकास को दशकों पीछे धकेल देती है।
अध्याय 13: मिड-डे मील—निवाले पर भ्रष्टाचार का सायाभूख और शिक्षा का संबंध:
भारत के सरकारी स्कूलों में ‘मिड-डे मील’ (दोपहर का भोजन) योजना इसलिए शुरू की गई थी ताकि कुपोषण दूर हो सके और गरीब बच्चे भूख के कारण पढ़ाई न छोड़ें। यह योजना करोड़ों बच्चों के लिए उम्मीद की किरण थी, लेकिन समय के साथ यह योजना भ्रष्टाचार का एक बड़ा अड्डा बन गई है।खाने की गुणवत्ता और बच्चों का स्वास्थ्य:अक्सर खबरों में सुनने को मिलता है कि कहीं खाने में छिपकली गिर गई, तो कहीं बच्चों को केवल नमक-रोटी परोसी जा रही है। जिस बजट में पौष्टिक दाल, सब्जी और फल मिलने चाहिए थे, वह पैसा बीच के बिचौलिए और भ्रष्ट अधिकारी डकार जाते हैं। जो खाना जानवरों के लायक भी नहीं होता, वह देश के भविष्य यानी मासूम बच्चों को खिलाया जाता है। क्या किसी नेता या बड़े अधिकारी का बच्चा उस खाने को हाथ भी लगाएगा?व्यवस्था की संवेदनहीनता:जब भी कोई बड़ी घटना होती है, तो कुछ समय के लिए जांच बैठती है, एक-दो लोगों को निलंबित (Suspend) किया जाता है और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। न तो रसोइयों को समय पर मानदेय मिलता है और न ही स्कूलों में साफ-सफाई का कोई इंतजाम होता है। यह सिर्फ एक भोजन की थाली नहीं है, यह सरकार की अपने बच्चों के प्रति जिम्मेदारी का पैमाना है, जिसमें वह हर दिन फेल हो रही है।
अध्याय 14: युवाओं में बढ़ता नशे का चलन और सरकारी तंत्रभटकती युवा पीढ़ी:
आज गांव हो या शहर, युवाओं की एक बड़ी आबादी नशे की गिरफ्त में जा रही है। जिस उम्र में हाथ में कलम या औजार होना चाहिए था, वहां सुल्फा, गांजा और घातक रसायनों ने जगह ले ली है। यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी राजनीतिक साजिश भी लगती है।ठेकों की राजनीति:एक तरफ सरकार ‘नशा मुक्ति’ के विज्ञापन चलाती है, और दूसरी तरफ हर गली-नुक्कड़ पर शराब और नशे के ठेकों को लाइसेंस बांटती है। राजस्व (Revenue) कमाने के चक्कर में सरकारें यह भूल जाती हैं कि वे अपनी सबसे बड़ी पूंजी—युवा शक्ति—को खो रही हैं। जब युवा नशे में डूबा रहेगा, तो वह रोजगार, शिक्षा और अपने अधिकारों पर सवाल कैसे उठाएगा?
अध्याय 15:
कागजों की लड़ाई—
जाति और निवास प्रमाण पत्रतहसील का चक्कर और आम आदमी:एक गरीब छात्र को जब अपनी पहचान साबित करनी होती है, तो उसे तहसील और कचहरी के चक्कर काटने पड़ते हैं। जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र बनवाना किसी जंग जीतने से कम नहीं है। डिजिटल इंडिया के दौर में भी एक लेखपाल या बाबू के दस्तखत के बिना फाइल आगे नहीं बढ़ती।
दलालों का बोलबाला:
अध्याय 16: बच्चों की छात्रवृत्ति और व्यवस्था की लापरवाहीछात्रवृत्ति:
सरकारी दफ्तरों के बाहर बैठे दलाल खुलेआम पैसों की मांग करते हैं। जो काम मुफ्त या कम दाम में होना चाहिए, उसके लिए एक गरीब को अपनी मजदूरी छोड़कर दिन भर खड़ा रहना पड़ता है। यह व्यवस्था आम आदमी की मदद के लिए बनाई गई थी, लेकिन आज यह उसे मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करने का जरिया बन गई है।
एक अधिकार या उपकार?सरकारें बड़े-बड़े विज्ञापनों में दावा करती हैं कि कोई भी बच्चा पैसों की कमी के कारण पढ़ाई नहीं छोड़ेगा। इसके लिए छात्रवृत्ति की योजनाएं चलाई जाती हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि एक गरीब छात्र को अपनी ही छात्रवृत्ति पाने के लिए दफ्तरों के इतने चक्कर काटने पड़ते हैं कि उसका पढ़ाई से मन उचट जाता है। सरकार इसे एक ‘अधिकार’ के बजाय ‘उपकार’ की तरह पेश करती है।
पोर्टल और कागजों का मकड़जाल:
आज के डिजिटल युग में सब कुछ ऑनलाइन हो गया है, जो सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन ग्रामीण इलाकों के बच्चों के लिए यह किसी सजा से कम नहीं है। कभी पोर्टल नहीं चलता, कभी आधार लिंक नहीं होता, तो कभी बैंक के चक्कर काटते-काटते साल बीत जाता है। कई बार तो पढ़ाई पूरी हो जाती है, पर छात्रवृत्ति का पैसा तब आता है जब उसकी जरूरत खत्म हो चुकी होती है।
अपात्रों का बोलबाला और भ्रष्टाचार:
सबसे बड़ा कड़वा सच यह है कि कई बार छात्रवृत्ति उन बच्चों तक पहुँच ही नहीं पाती जो इसके असली हकदार हैं। फर्जी दस्तावेज बनवाकर अमीर और रसूखदार लोग अपने बच्चों के लिए छात्रवृत्ति हथिया लेते हैं, जबकि असली गरीब बच्चा फीस न भर पाने के कारण स्कूल छोड़ने पर मजबूर हो जाता है। छात्रवृत्ति के नाम पर होने वाले घोटाले यह बताते हैं कि हमारी व्यवस्था के भीतर की नैतिकता कितनी गिर चुकी है।नेताओं की राजनीति:चुनाव आते ही छात्रवृत्ति की राशि बढ़ाने की घोषणाएं तो कर दी जाती हैं, लेकिन बजट में उसके लिए पर्याप्त प्रावधान नहीं होता। पिछड़े और दलित वर्ग के बच्चों के नाम पर राजनीति तो खूब होती है, मगर जब उनकी पढ़ाई के लिए समय पर पैसा देने की बात आती है, तो खजाना खाली होने का बहाना बना दिया जाता है। छात्रवृत्ति केवल एक आर्थिक मदद नहीं है, यह एक विद्यार्थी के आत्मविश्वास की नींव है। अगर व्यवस्था इसे समय पर और ईमानदारी से नहीं दे सकती, तो वह देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है।
अध्याय 17:
स्कूल की फीस और किताबों का माफिया
आज के समय में शिक्षा एक सेवा नहीं बल्कि एक बहुत बड़ा व्यापार बन चुकी है। निजी स्कूलों ने शिक्षा को एक ऐसा उत्पाद बना दिया है जिसे केवल ऊंचे दामों पर खरीदा जा सकता है। हर साल सत्र शुरू होते ही माता-पिता पर भारी भरकम फीस का बोझ डाल दिया जाता है।सबसे बड़ी समस्या है ‘किताबों का माफिया’। स्कूल प्रशासन और प्रकाशकों (Publishers) के बीच एक गुप्त समझौता होता है। हर साल जानबूझकर किताबों के संस्करण (Editions) बदल दिए जाते हैं ताकि गरीब बच्चा अपने बड़े भाई या बहन की पुरानी किताबों से न पढ़ सके। स्कूल से ही किताबें और वर्दी (Uniform) खरीदने का दबाव बनाया जाता है, जिसकी कीमत बाजार से दोगुनी होती है। अगर कोई अभिभावक आवाज उठाता है, तो बच्चे के भविष्य को ढाल बनाकर उन्हें चुप करा दिया जाता है। सरकार को इस पर कड़े कानून बनाने होंगे ताकि शिक्षा की दुकानदारी बंद हो सके।
अध्याय 18:
जी.एस.टी. और मध्यम वर्ग की कमर
जी.एस.टी. (वस्तु एवं सेवा कर) को ‘एक देश, एक कर’ के सपने के साथ लागू किया गया था। लेकिन हकीकत में इसने मध्यम वर्ग और छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। आज एक साधारण व्यक्ति को अपनी मेहनत की कमाई का एक बड़ा हिस्सा टैक्स के रूप में देना पड़ता है।हैरानी की बात यह है कि विलासिता की वस्तुओं और आम जरूरत की चीजों के टैक्स स्लैब में बहुत कम अंतर रह गया है। दवाइयों से लेकर बच्चों की पढ़ाई की सामग्री तक, हर चीज पर कर का बोझ है। एक छोटा दुकानदार जो मुश्किल से अपना घर चलाता है, उसे कागजी कार्रवाई और ऑनलाइन रिटर्न के चक्कर में इतना उलझा दिया गया है कि वह अपने काम पर ध्यान नहीं दे पाता। जब तक टैक्स प्रणाली को सरल और आम आदमी के अनुकूल नहीं बनाया जाएगा, तब तक आर्थिक न्याय संभव नहीं है।
अध्याय 19:
नेताओं की बदलती सोच और खोखले वादे
पुराने समय के राजनेताओं के पास एक विचारधारा होती थी, वे देश के लिए जेल जाते थे और त्याग करते थे। मगर आज के दौर में नेताओं की सोच केवल ‘सत्ता’ और ‘स्वार्थ’ तक सीमित रह गई है। आज राजनीति में आना एक निवेश (Investment) की तरह हो गया है, जहाँ चुनाव जीतने के लिए करोड़ों खर्च किए जाते हैं ताकि बाद में उसे कई गुना करके वसूला जा सके।नेताओं की सोच अब इस बात पर टिकी है कि जनता को कैसे जातियों और धर्मों में बांटकर वोट बटोरे जाएं। विकास की बातें केवल विज्ञापनों तक सीमित हैं। युवाओं को रोजगार देने के बजाय उन्हें झूठे सपनों की अफीम चखाई जाती है। जब तक नेता जनता के प्रति जवाबदेह नहीं होंगे और उनकी सोच में ‘जनसेवा’ वापस नहीं आएगी, तब तक लोकतंत्र केवल नाम का रह जाएगा।
अध्याय 20:
सरकारी बनाम निजी स्कूल –
शिक्षा का बंटवाराभारत जैसे लोकतांत्रिक देश में शिक्षा ही वह माध्यम है जिससे समानता आ सकती थी, लेकिन आज शिक्षा ने ही समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है। सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। कहीं छत नहीं है, तो कहीं शिक्षक नहीं। दूसरी ओर, निजी स्कूलों की चकाचौंध है जहाँ शिक्षा से ज्यादा सुविधाओं का व्यापार होता है।जब देश का बजट बनता है, तो शिक्षा पर खर्च को ‘खर्च’ माना जाता है, ‘निवेश’ नहीं। नेताओं के अपने बच्चे विदेशों में या देश के सबसे महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं, इसलिए उन्हें सरकारी स्कूलों की बदहाली कभी महसूस नहीं होती। जब तक कलेक्टर और विधायक का बच्चा सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ेगा, तब तक इन स्कूलों की स्थिति नहीं सुधरेगी। शिक्षा का यह बंटवारा आने वाली पीढ़ी के बीच एक गहरी खाई पैदा कर रहा है।
अध्याय 21:
जी.एस.टी. का मायाजाल और छोटा व्यापारीजी.एस.टी. को एक सरल कर प्रणाली कहकर प्रचारित किया गया था, लेकिन एक छोटे कस्बे के व्यापारी के लिए यह किसी भूलभुलैया से कम नहीं है। पहले एक व्यापारी अपने व्यापार पर ध्यान देता था, आज वह आधा समय कागजों और कंप्यूटर के चक्कर काटने में बिताता है।टैक्स की दरें इतनी पेचीदा हैं कि आम आदमी को समझ ही नहीं आता कि वह किस चीज का कितना पैसा दे रहा है। दूध, दही और जरूरी खाद्य पदार्थों पर भी जब टैक्स की मार पड़ती है, तो सबसे ज्यादा चोट उस गरीब की थाली पर लगती है जो रोज कमाता और रोज खाता है। यह कानून बड़े घरानों को ध्यान में रखकर बनाया गया लगता है, क्योंकि उनके पास हिसाब-किताब के लिए वकीलों की फौज होती है, जबकि एक छोटा दुकानदार खुद ही मजदूर है और खुद ही मालिक।
अध्याय 22:
आधुनिक राजनीति और नेताओं का गिरता स्तरराजनीति कभी ‘राष्ट्र निर्माण’ का माध्यम हुआ करती थी, लेकिन आज यह ‘सत्ता प्राप्ति’ का व्यापार बन गई है। नेताओं की सोच अब जनहित से हटकर चुनाव जीतने के समीकरणों तक सिमट गई है। आज का नेता जनता का सेवक नहीं, बल्कि खुद को जनता का भाग्य विधाता समझने लगा है।समय बदलने के साथ नेताओं ने तकनीक का सहारा तो लिया, लेकिन अपनी नीयत नहीं बदली। सोशल मीडिया का इस्तेमाल अब विकास दिखाने के लिए नहीं, बल्कि विरोधियों को नीचा दिखाने और समाज में जहर घोलने के लिए किया जाता है। चुनावों के दौरान मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का जो नया चलन शुरू हुआ है, वह देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है। नेताओं को समझना होगा कि जनता जागरूक हो रही है और केवल नारों से पेट नहीं भरता।
अध्याय 23:
आदिवासियों का विस्थापन:
विकास के नाम पर अपनी ही ज़मीन से बेदखलीविस्तार: भारत के आदिवासी, जो इस धरती के असली रखवाले हैं, आज अपने ही घर में अजनबी बना दिए गए हैं। ‘विकास’ का पहिया जब भी घूमता है, सबसे पहले आदिवासियों की ज़मीन को कुचलता है। पहाड़ों में छिपा खनिज और जंगलों की लकड़ी उद्योगपतियों की आँखों में चमक पैदा करती है, और फिर शुरू होता है विस्थापन का काला खेल। उन्हें उनकी ज़मीन से यह कहकर हटा दिया जाता है कि यहाँ बांध बनेगा या खदान खुदेगी, और बदले में उन्हें कंक्रीट के उन छोटे कमरों में धकेल दिया जाता है जहाँ न उनकी संस्कृति बचती है और न ही गरिमा। जिन्हें हम ‘जल-जंगल-ज़मीन’ का मालिक कहते थे, आज वे अपने ही पुरखों की ज़मीन पर ‘मज़दूर’ बनकर रह गए हैं।
असली घटना (Real Case):
नर्मदा बचाओ आंदोलन और हसदेव अरण्य का संघर्ष। सरदार सरोवर बांध के कारण हज़ारों आदिवासियों को विस्थापित होना पड़ा, जिनमें से कई को आज दशकों बाद भी सही मुआवज़ा और पुनर्वास नहीं मिला है। वहीं छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगलों में आज भी आदिवासी पेड़ों को गले लगाकर खड़े हैं ताकि उन्हें काटा न जाए। पुलिस की लाठियां और सरकारों का दबाव उन्हें ‘नक्सली’ घोषित कर देता है जब वे अपनी ज़मीन और संस्कृति बचाने के लिए आवाज़ उठाते हैं। यह विकास नहीं, बल्कि एक पूरी सभ्यता का विनाश है।
समाधान (Solution):
‘पेसा कानून’ (PESA Act) और ‘वनाधिकार अधिनियम’ को सख्ती से लागू करना होगा। बिना ग्राम सभा की लिखित सहमति के एक इंच ज़मीन भी नहीं ली जानी चाहिए। विकास का मॉडल ऐसा होना चाहिए जिसमें आदिवासी केवल मज़दूर न हों, बल्कि उस विकास में हिस्सेदार हों। उनके पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करना सरकार की संवैधानिक ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।
अध्याय 24:
उपसंहार:
एक नए भारत का संकल्प (भविष्य की राह)विस्तार:
30 अध्यायों का यह सफर केवल समस्याओं की गिनती नहीं था, बल्कि यह हमारे समाज के उस जख्म की गहराई को नापने की कोशिश थी जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। हमने देखा कि कैसे राजनीति ने नफरत का व्यापार किया, कैसे भ्रष्टाचार ने देश की नींव को खोखला किया और कैसे आम आदमी की आवाज़ को सत्ता के शोर में दबा दिया गया। लेकिन यह किताब केवल दुख की दास्तां नहीं है, यह बदलाव का एक आह्वान है। बदलाव तब नहीं आता जब सरकारें बदलती हैं, बदलाव तब आता है जब इस देश का ‘नितिन’ (आम नागरिक) जागता है। जब हम धर्म और जाति की दीवारों को तोड़कर ‘न्याय’ और ‘रोज़गार’ की बात करेंगे, तभी लोकतंत्र का सूरज उदय होगा।
भविष्य की राह (The Path Forward):
1. ईमानदार भागीदारी: राजनीति को सिर्फ ‘नेताओं’ पर न छोड़ें। शिक्षित और ईमानदार युवाओं को व्यवस्था का हिस्सा बनना होगा।
2. सूचना की शक्ति: सूचना का अधिकार (RTI) का इस्तेमाल करें और हर सरकारी पैसे का हिसाब मांगें।
3. संवैधानिक जागरूकता: अपने अधिकारों के साथ-साथ बाबा साहेब द्वारा दिए गए ‘संवैधानिक कर्तव्यों’ को भी समझें।
4. सामूहिक एकता: याद रखें, एक अकेली लकड़ी को तोड़ना आसान है, लेकिन गट्ठर को नहीं। जब तक जनता एकजुट है, कोई भी तानाशाह टिक नहीं सकता।
अंतिम शब्द:
“ये रात चाहे कितनी भी काली क्यों न हो, सुबह का होना तय है। बस शर्त यह है कि हम मशाल जलाना न छोड़ें।” यह किताब उसी मशाल की एक छोटी सी लौ है।
अध्याय 25:
मज़दूरों का शोषण:
पसीने की चोरी और बेबसीविस्तार: भारत का निर्माण उन हाथों ने किया है जिनमें छाले पड़े हैं—मज़दूर। चाहे गगनचुंबी इमारतें हों या सड़कों का जाल, सब मज़दूरों के पसीने से सींचा गया है। लेकिन आज मज़दूर समाज की सबसे उपेक्षित कड़ी है। न्यूनतम वेतन (Minimum Wage) केवल कागज़ों पर है। ठेकेदार और मालिक मज़दूरों का खून चूसते हैं और उन्हें जानवरों जैसी स्थितियों में रहने को मजबूर करते हैं। जब किसी मज़दूर की काम के दौरान मौत होती है, तो उसे ‘हादसा’ कहकर फाइल बंद कर दी जाती है। सुरक्षा के उपकरण नहीं दिए जाते क्योंकि मज़दूर की जान की कीमत एक मशीन के पुर्ज़े से भी कम समझी जाती है।
असली घटना (Real Case):
सिल्क्यारा टनल हादसा (उत्तराखंड, 2023)। उत्तरकाशी में सुरंग निर्माण के दौरान 41 मज़दूर हफ़्तों तक अंदर फंसे रहे। जाँच में सामने आया कि निर्माण कंपनी ने मज़दूरों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी ‘एस्केप टनल’ (निकास सुरंग) नहीं बनाई थी। विकास की अंधी दौड़ में मज़दूरों की जान को दांव पर लगा दिया गया। इसी तरह, देश के बड़े शहरों में सीवर सफाई के दौरान आज भी मज़दूर ‘दम घुटने’ से मर रहे हैं, जबकि मशीनों से सफाई के दावे किए जाते हैं।
समाधान (Solution):
मज़दूरों के लिए ‘कठोर सुरक्षा कानून’ लागू होने चाहिए। अगर किसी मज़दूर की मौत सुरक्षा चूक से होती है, तो कंपनी के मालिक पर सीधे हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। मज़दूरों का बीमा अनिवार्य हो और ठेकेदारी प्रथा को खत्म कर उन्हें सीधे संस्था से जोड़ना चाहिए।
अध्याय 26:
नशे का बढ़ता जाल और राजनीति का हाथविस्तार:
आज हमारे देश की युवा पीढ़ी नशे के अंधेरे में खोती जा रही है। गाँव-गाँव और शहर-शहर में शराब, चरस, गांजा और घातक सिंथेटिक ड्रग्स आसानी से उपलब्ध हैं। लेकिन क्या यह मुमकिन है कि पुलिस और प्रशासन की नाक के नीचे इतना बड़ा व्यापार बिना किसी “बड़े हाथ” के चल सके? राजनीति और नशे के सौदागरों के बीच एक गहरा गठबंधन है। नशे की कमाई का इस्तेमाल चुनावों में किया जाता है, और बदले में इन सौदागरों को सरकारी संरक्षण मिलता है। जब युवा नशेड़ी बन जाता है, तो वह सवाल पूछना भूल जाता है, और यही बात भ्रष्ट नेताओं के पक्ष में काम करती है।
असली घटना (Real Case):
गुजरात बंदरगाह (Mundra Port) पर भारी मात्रा में ड्रग्स की बरामदगी और पंजाब का ड्रग संकट। हाल के वर्षों में मुंद्रा पोर्ट पर हज़ारों करोड़ रुपये की ‘हेरोइन’ पकड़ी गई, लेकिन इसके असली मालिकों और राजनीतिक कनेक्शनों की जाँच अक्सर ठंडी पड़ जाती है। पंजाब जैसे समृद्ध राज्य को नशे ने पूरी तरह खोखला कर दिया है। जब ड्रग माफिया पकड़े जाते हैं, तो अक्सर उनके पीछे किसी न किसी बड़े नेता का संरक्षण सामने आता है।
समाधान (Solution):
ड्रग्स के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति होनी चाहिए। नशा छुड़ाने के लिए सरकारी केंद्रों की संख्या बढ़ानी होगी। लेकिन सबसे ज़रूरी है—नशे के व्यापार के ‘राजनीतिक वित्तपोषण’ (Funding) को तोड़ना। युवाओं को खेल और रोज़गार से जोड़ना होगा ताकि वे नशे के रास्ते पर न जाएँ।
अध्याय 27:
स्वास्थ्य बीमा का छलावा और आम आदमी की लूटविस्तार:
सरकार ने “आयुष्मान भारत” जैसी योजनाएं शुरू कीं ताकि गरीब को इलाज मिल सके। लेकिन हकीकत यह है कि प्राइवेट हस्पतालों ने इसे लूट का ज़रिया बना लिया है। गरीब कार्ड लेकर भटकता रहता है और हस्पताल उसे “बेड नहीं है” कहकर वापस कर देते हैं। दूसरी तरफ, मध्यम वर्ग ‘हेल्थ इंश्योरेंस’ (स्वास्थ्य बीमा) की किश्तें भरते-भरते थक जाता है, लेकिन जब बीमारी आती है, तो बीमा कंपनियाँ ‘नियम और शर्तों’ के जाल में फंसाकर क्लेम देने से मना कर देती हैं। इलाज अब सेवा नहीं, बल्कि एक कॉर्पोरेट साज़िश बन गया है जहाँ मरीज़ की जान से ज़्यादा उसकी जेब पर नज़र रखी जाती है।
असली घटना (Real Case):
आयुष्मान कार्ड घोटाला (कैग रिपोर्ट, 2023)। सीएजी (CAG) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि एक ही मोबाइल नंबर पर हज़ारों आयुष्मान कार्ड रजिस्टर्ड थे और कई ऐसे लोगों के नाम पर इलाज का पैसा निकाला गया जो मर चुके थे। हस्पतालों ने फर्ज़ी बिल बनाकर सरकारी खज़ाने को चूना लगाया। यह दिखाता है कि तकनीक के दौर में भी भ्रष्टाचार ने कैसे नई राहें ढूंढ ली हैं।
समाधान (Solution):
स्वास्थ्य बीमा के बजाय सरकार को ‘यूनिवर्सल हेल्थकेयर’ (सबके लिए मुफ्त स्वास्थ्य सेवा) पर ध्यान देना चाहिए जैसा कई विकसित देशों में है। हस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच के इस गठबंधन की उच्च स्तरीय जाँच होनी चाहिए। इलाज की दरों पर सरकारी नियंत्रण होना चाहिए ताकि कोई मजबूरी का फायदा न उठा सके
अध्याय 28:
न्यायालय में देरी और गरीब की बेबसीविस्तार:
न्याय के बारे में कहा जाता है कि “देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।” आज हमारे देश की अदालतों में करोड़ों मामले लंबित हैं। एक गरीब आदमी अपनी पूरी ज़िंदगी कोर्ट के चक्कर काटते-काटते गुज़ार देता है, मगर उसे इंसाफ नहीं मिलता। तारीख पर तारीख मिलती है, वकीलों की फीस भरनी पड़ती है, और अंत में गरीब हार मानकर बैठ जाता है। वहीं दूसरी तरफ, अमीर और ताकतवर लोग बड़े-बड़े वकील करके कानून की खिड़कियों से निकल जाते हैं। न्यायपालिका में भी अब भ्रष्टाचार और सिफारिश की बातें सुनने को मिलती हैं, जो लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक संकेत है।
असली घटना (Real Case):
विष्णु तिवारी मामला (ललितपुर)। विष्णु तिवारी को एक ऐसे जुर्म में जेल भेजा गया जो उसने कभी किया ही नहीं था। उसे 20 साल तक जेल में रहना पड़ा। जब 20 साल बाद हाई कोर्ट ने उसे निर्दोष पाया, तब तक उसके माता-पिता की मौत हो चुकी थी और उसका घर-बार सब उजड़ गया था। उसकी ज़िंदगी के उन कीमती 20 सालों का हिसाब कौन देगा? यह मामला दिखाता है कि हमारा सिस्टम निर्दोषों को सजा देने में कितना तेज़ और इंसाफ देने में कितना सुस्त है।
समाधान (Solution):
‘फास्ट-ट्रैक’ अदालतों की संख्या बढ़ानी होगी। जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता लानी होगी और उनकी संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि मामलों का निपटारा जल्दी हो सके। गरीबों के लिए मुफ्त और सच्ची कानूनी सहायता (Legal Aid) की व्यवस्था को मज़बूत करना होगा ताकि पैसा न्याय के रास्ते में रुकावट न बने।
अध्याय 29:
पुलिस तंत्र का राजनीतिकरण और खौफविस्तार:
पुलिस का प्राथमिक काम जनता की सुरक्षा करना है, लेकिन आज पुलिस अक्सर सत्ता में बैठे नेताओं के ‘हथियार’ की तरह काम करती है। नेताओं के इशारे पर झूठे मुकदमे लिखना, विपक्ष के लोगों को डराना-धमकाना और आपसी दुश्मनी निकालना आम बात हो गई है। थाने में गरीब की सुनवाई नहीं होती, जबकि बड़े गुंडों और सफेदपोश नेताओं को वहाँ सम्मान मिलता है। ‘कस्टोडियल टॉर्चर’ (पुलिस हिरासत में मारपीट) से कई बार निर्दोषों की मौत हो जाती है, मगर उन वर्दीवाले गुनहगारों पर अक्सर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं होती।
असली घटना (Real Case):
पी. जयराज और बेनिक्स मामला (तमिलनाडु, 2020)। लॉकडाउन के दौरान सिर्फ दुकान थोड़ी देर ज़्यादा खुली रखने के छोटे से जुर्म में बाप-बेटे को पुलिस ने हिरासत में लिया और उन पर इतना जुल्म किया कि उनकी मौत हो गई। यह दरिंदगी दिखाती है कि जब कानून के रखवाले ही कातिल बन जाएं, तो जनता कहाँ जाए? ऐसी घटनाएँ हर दिन किसी न किसी कोने में होती हैं, जहाँ वर्दीवाले नेताओं की चाटुकारिता में अपनी इंसानियत भूल जाते हैं।
समाधान (Solution):
पुलिस सुधार (सुप्रीम कोर्ट का प्रकाश सिंह जजमेंट) को तुरंत लागू करना चाहिए ताकि पुलिस पर से नेताओं का सीधा कब्जा खत्म हो। पुलिस की जवाबदेही (Accountability) तय होनी चाहिए। अगर हिरासत में मौत होती है, तो संबंधित अधिकारियों पर सीधे हत्या का मुकदमा चलना चाहिए। पुलिस को जनता का दोस्त बनना चाहिए, नेताओं का गुलाम नहीं।
अध्याय 30:
दलित और पिछड़ों का शोषण:
समानता का ढोंगविस्तार: आज़ादी के इतने सालों बाद भी, समाज में ‘जाति’ का ज़हर खत्म नहीं हुआ है। आज भी दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों को उनके अधिकार मांगने पर दबाया जाता है। मंदिरों में प्रवेश से रोकना, घोड़ी पर चढ़ने पर हमला करना और उनकी बस्तियों को जलाना आज भी अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं। राजनीति में इनके नाम पर वोट तो लिए जाते हैं, मगर जब हक देने की बारी आती है, तो वही पुरानी संकुचित मानसिकता सामने आ जाती है। आरक्षण पर सवाल उठाए जाते हैं, मगर उस ‘असमानता’ पर कोई बात नहीं करता जो सदियों से चली आ रही है और आज भी मौजूद है।
असली घटना (Real Case):
इंद्र मेघवाल मामला (राजस्थान, 2022)। एक 9 साल का मासूम बच्चा, इंद्र मेघवाल, सिर्फ इसलिए अपनी जान गँवा बैठा क्योंकि उसने अपने स्कूल में ‘ऊँची जाति’ के शिक्षक के घड़े से पानी पी लिया था। उसे इतना पीटा गया कि उसकी अस्पताल में मौत हो गई। यह घटना हमारे समाज के मुँह पर एक तमाचा है जो ‘डिजिटल इंडिया’ की बातें तो करता है पर जाति के नाम पर बच्चों का खून बहाने से भी नहीं हिचकता।
समाधान (Solution):
सिर्फ कानून बनाने से समाज नहीं बदलेगा, बल्कि ‘मानवता की शिक्षा’ से बदलाव आएगा। जाति-विरोधी कानूनों (SC/ST Act) को मज़बूती से लागू करना चाहिए। सामाजिक भेदभाव करने वालों का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए। जब तक हम इंसान को उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके गुणों से नहीं पहचानेंगे, तब तक भारत वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता
