अध्याय 60: रसोई पर डाका—4000 का सिलेंडर और सरकार का सफेद झूठ​1. भूमिका:

चूल्हे की आग और पेट की भूखएक समय था जब राजनीति में 10-20 रुपये की महंगाई बढ़ने पर सड़कें जाम हो जाती थीं, नेता संसद के बाहर गैस सिलेंडर लेकर प्रदर्शन करते थे। लेकिन आज दिल्ली जैसे महानगर में जब एक रसोई गैस का सिलेंडर 4000 रुपये के आंकड़े को छू रहा है, तो चारों तरफ एक रहस्यमयी चुप्पी है। सरकार दावा करती है कि सब कुछ ‘सामान्य’ है, लेकिन एक मजदूर, एक छोटा दुकानदार और एक मध्यमवर्गीय परिवार की रसोई में आज मातम जैसा माहौल है। यह केवल महंगाई नहीं है, यह आम आदमी की जेब पर संगठित डकैती है।​2. 350 रुपये किलो गैस—कालाबाजारी या मजबूरी?जब सरकारी सिलेंडर की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाती हैं, तो ‘ब्लैक मार्केट’ या कालाबाजारी का जन्म होता है। आज दुकानों पर 350 रुपये प्रति किलो के हिसाब से गैस बेची जा रही है। इसका मतलब है कि एक गरीब आदमी, जो एक साथ 4000 रुपये नहीं दे सकता, वह अपनी दिहाड़ी का एक बड़ा हिस्सा महज एक किलो गैस के लिए लुटा रहा है। यह स्थिति तब पैदा होती है जब आपूर्ति (Supply) को जानबूझकर रोका जाता है या वितरण प्रणाली (Distribution) में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार होता है। सरकार की नाक के नीचे यह सब हो रहा है, फिर भी प्रशासन यह कह रहा है कि बाजार नियंत्रण में है।​3. सरकार का दावा बनाम जमीनी हकीकतसरकार की ओर से बार-बार तर्क दिया जाता है कि “अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और गैस के दाम बढ़ गए हैं।” लेकिन सच्चाई यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरती हैं, तब भी भारत में दाम कम नहीं किए जाते। सरकार टैक्स के माध्यम से अपना खजाना भर रही है, जबकि जनता का घर खाली हो रहा है।​दावा: “उज्ज्वला योजना से हर घर में गैस पहुँच गई है।”​हकीकत: गैस तो पहुँच गई, लेकिन खाली सिलेंडर आज घर के कोने में धूल फांक रहे हैं क्योंकि उसे दोबारा भरवाने की हैसियत अब आम आदमी की नहीं रही। सरकार ने सब्सिडी को लगभग खत्म कर दिया है, जिससे गरीब फिर से लकड़ी और उपलों के धुएं में खाना पकाने को मजबूर है।​4. महंगाई का चक्र: गैस से लेकर थाली तकगैस महंगी होने का मतलब सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं है। जब गैस महंगी होती है, तो होटलों का खाना महंगा होता है, माल ढुलाई महंगी होती है और अंत में सब्जी, दाल और दूध के दाम भी बढ़ जाते हैं। दिल्ली जैसे शहर में जहाँ किराया और बिजली पहले ही आसमान छू रहे हैं, वहां 4000 रुपये का सिलेंडर एक आम आदमी की बचत को पूरी तरह खत्म कर देता है। यह स्थिति व्यक्ति को कर्ज के जाल में धकेल रही है। लोग बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य के बजट में कटौती करके पेट की आग बुझा रहे हैं।​5. कॉरपोरेट का फायदा और जनता का नुकसानमहंगाई के इस दौर में अगर कोई अमीर हो रहा है, तो वह हैं गैस और तेल क्षेत्र की बड़ी कंपनियां। उनके मुनाफे हर साल रिकॉर्ड तोड़ रहे हैं, जबकि आम आदमी की आय या तो स्थिर है या घट रही है। सरकार इन कंपनियों पर नकेल कसने के बजाय उन्हें ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ के नाम पर खुली छूट दे रही है। जब सरकार कहती है कि “सब नॉर्मल है,” तो वह दरअसल अपने उन उद्योगपति मित्रों की बात कर रही होती है जिनके लिए ये कीमतें कोई मायने नहीं रखतीं।​6. विपक्ष की चुप्पी और मीडिया का दोहरा रवैयाइस अध्याय का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जब सिलेंडर 4000 का मिल रहा है, तब भी मुख्यधारा का मीडिया इसे ‘न्यूज’ नहीं मानता। वे आपको दिखाएंगे कि किसी फिल्म स्टार ने क्या पहना या सीमा पार क्या हो रहा है। महंगाई जैसे बुनियादी मुद्दे को ‘पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। विपक्ष भी केवल ट्विटर और बयानों तक सीमित है; सड़कों पर वह संघर्ष गायब है जो जनता के हक के लिए होना चाहिए था।​7. निष्कर्ष: जनता का मौन कब टूटेगा?सरकार का यह दावा कि “सब ठीक है,” दरअसल जनता के सब्र की परीक्षा है। जब तक जनता धर्म और जाति के मुद्दों से ऊपर उठकर अपनी रसोई और अपनी जेब के बारे में सवाल नहीं पूछेगी, तब तक यह लूट जारी रहेगी। 4000 रुपये का सिलेंडर केवल एक संख्या नहीं है, यह उस व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है जिसने आम आदमी को लावारिस छोड़ दिया है।

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