​अध्याय 59: लोकतंत्र का गिरता चौथा स्तंभ—मीडिया या सत्ता का लाउडस्पीकर ?​

भूमिका: निष्पक्षता का अंत और चाटुकारिता का उदयलोकतंत्र के चार आधार स्तंभ होते हैं: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया। पहले तीन स्तंभों पर नजर रखने और उनकी कमियों को जनता के सामने लाने की जिम्मेदारी मीडिया की होती है। इसीलिए इसे ‘वॉचडॉग’ (Watchdog) कहा जाता था। लेकिन आज भारत का मुख्यधारा मीडिया ‘वॉचडॉग’ से बदलकर ‘लैपडॉग’ (Lapdog) बन चुका है। पत्रकारिता का मूल मंत्र था— “सत्ता से कठिन सवाल पूछना,” लेकिन आज का मूल मंत्र बन गया है— “सत्ता के बचाव में जनता से ही सवाल पूछना।”​जब मीडिया अपनी रीढ़ खो देता है, तो लोकतंत्र अंधकार में चला जाता है। आज शाम 8 बजे के बाद न्यूज़ चैनलों पर जो चीख-पुकार मचती है, वह सूचना देने के लिए नहीं, बल्कि जनता के दिमाग को सुन्न करने के लिए होती है। यह अध्याय उन तथ्यों और सबूतों की बात करेगा जो यह साबित करते हैं कि भारतीय मीडिया अब आजाद नहीं रहा।​2. टीआरपी की अंधी दौड़ और सनसनीखेज पत्रकारितामीडिया घरानों के लिए अब पत्रकारिता एक मिशन नहीं, बल्कि करोड़ों का ‘बिजनेस’ है। इस बिजनेस को चलाने के लिए उन्हें विज्ञापन (Ads) चाहिए और विज्ञापनों के लिए उन्हें टीआरपी (TRP) चाहिए। टीआरपी पाने का सबसे आसान तरीका है— ‘डर’ और ‘नफरत’ बेचना।​न्यूज़ चैनलों के स्टूडियो अब जंग के मैदान की तरह दिखते हैं। ग्राफ़िक्स के जरिए रॉकेट, आग के गोले और खतरनाक म्यूजिक बजाकर साधारण खबरों को भी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बनाया जाता है। ‘सुशांत सिंह राजपूत’ केस इसका सबसे बड़ा सबूत है। महीनों तक न्यूज़ चैनलों ने बिना किसी सबूत के एक सर्कस चलाया, जबकि उस समय देश की जीडीपी गिर रही थी और बेरोजगारी चरम पर थी। जब मीडिया असली मुद्दों को छोड़कर किसी की निजी जिंदगी में झांकने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि वह अपनी मौत खुद लिख रहा है।​3. सरकार का विज्ञापन और ‘पेड़ न्यूज़’ का खेलआजाद मीडिया के लिए सबसे बड़ा खतरा सरकार पर आर्थिक निर्भरता है। केंद्र और राज्य सरकारें हर साल विज्ञापनों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च करती हैं। जब किसी न्यूज़ चैनल की कमाई का 60% से 70% हिस्सा सरकारी विज्ञापनों से आता है, तो उस चैनल की हिम्मत नहीं होती कि वह सरकार की किसी भी नीति (जैसे नोटबंदी, जीएसटी या बेरोजगारी) पर सवाल उठाए।​अगर कोई चैनल सवाल उठाता है, तो उसके विज्ञापन बंद कर दिए जाते हैं या उस पर इनकम टैक्स और ईडी (ED) की छापेमारी करवा दी जाती है। ‘दैनिक भास्कर’ और ‘एनडीटीवी’ जैसे संस्थानों के साथ जो हुआ, वह इसका सीधा सबूत (Proof) है। मीडिया को डराकर और खरीदकर उसे सत्ता की ढाल बना दिया गया है। आज न्यूज़ एंकर्स पत्रकारों की तरह नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं की तरह बात करते हैं।​4. हिंदू-मुस्लिम डिबेट और समाज में जहरमीडिया का सबसे खतरनाक रूप ‘धार्मिक ध्रुवीकरण’ में दिखता है। पिछले कुछ वर्षों के न्यूज़ डिबेट के आंकड़े उठाकर देख लीजिए। 80% डिबेट का विषय हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद, हलाल-झटका, या हिजाब जैसे मुद्दे होते हैं। मीडिया ने ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, और ‘थूक जिहाद’ जैसे शब्द ईजाद किए हैं ताकि बहुसंख्यक समाज के मन में अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत भरी जा सके।​कोरोना काल के दौरान ‘तबलीगी जमात’ के मुद्दे को जिस तरह से पेश किया गया, उसने समाज में इतना जहर भर दिया कि लोग आम सब्जी वालों तक को उनकी पहचान पूछकर प्रताड़ित करने लगे। जबकि बाद में अदालतों ने कहा कि उन पर लगाए गए आरोप बेबुनियाद थे। लेकिन मीडिया ने कभी माफी नहीं मांगी। मीडिया का काम समाज को जोड़ना था, लेकिन वह आज समाज को काटने की सबसे बड़ी मशीन बन गया है।​5. व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी और फेक न्यूज़ का सिंडिकेटआज का मीडिया केवल टीवी तक सीमित नहीं है। आईटी सेल (IT Cell) के जरिए जो झूठ सोशल मीडिया पर फैलाया जाता है, मुख्यधारा का मीडिया उसे बिना किसी जांच (Fact Check) के सच मानकर चलाने लगता है। गांधी, नेहरू और इतिहास के साथ जिस तरह की छेड़छाड़ की जाती है, उसे न्यूज़ चैनलों पर ‘स्पेशल रिपोर्ट’ के नाम पर पेश किया जाता है।​फेक न्यूज़ के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है। न्यूज़ चैनलों ने यहाँ तक दिखाया कि ‘2000 के नोट में चिप लगी है’ जो जमीन के नीचे से भी सिग्नल देगी। यह हंसाने वाली बात नहीं है, यह एक पत्रकार की बुद्धि और उसकी नैतिकता के पतन की पराकाष्ठा है। जब मीडिया झूठ को सच और सच को झूठ साबित करने पर उतारू हो जाए, तो जनता को अपनी आंखें खोल लेनी चाहिए।​6. असली मुद्दों की बलि (Unemployment vs Pakistan)जब भी बेरोजगारी पर कोई रिपोर्ट आती है या जब रुपया डॉलर के मुकाबले गिरता है, तो अचानक न्यूज़ चैनलों पर ‘पाकिस्तान’ की गरीबी या ‘चीन’ के साथ युद्ध की खबरें तेज हो जाती हैं। जनता का ध्यान भटकाने (Distraction) की यह तकनीक बहुत सोची-समझी है।​क्या आपने कभी किसी न्यूज़ एंकर को शिक्षा बजट पर सवाल पूछते देखा है? क्या कभी किसी ने यह पूछा कि छात्रवृत्ति का पैसा क्यों नहीं मिला? नहीं, क्योंकि वे जानते हैं कि इन मुद्दों पर चर्चा करने से टीआरपी नहीं मिलेगी और सरकार भी नाराज हो जाएगी। वे आपको उन मुद्दों में उलझाए रखते हैं जिनका आपके दैनिक जीवन से कोई संबंध नहीं है।​7. अंतरराष्ट्रीय सूचकांक (World Press Freedom Index) का सचतथ्यों के आधार पर बात करें तो ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, भारत ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ में लगातार नीचे गिर रहा है। 180 देशों की सूची में भारत का स्थान 160 के भी पार चला गया है। यह हमारे लिए शर्म की बात है। अफ़गानिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों से भी नीचे गिरना यह दर्शाता है कि यहाँ पत्रकारों पर कितना दबाव है। कई पत्रकारों को जेल में डाला गया, कई की हत्या कर दी गई, लेकिन गोदी मीडिया इस पर मौन रहा।​8. समाधान: जनता ही आखिरी रास्ता हैमीडिया को सुधारने का अब एक ही रास्ता बचा है— जनता। जब तक जनता इन चीखने-चिल्लाने वाले चैनलों को देखना बंद नहीं करेगी, इनका धंधा बंद नहीं होगा। हमें ‘सब्सक्रिप्शन’ आधारित निष्पक्ष डिजिटल मीडिया का समर्थन करना होगा जो विज्ञापनों के लिए सरकार का गुलाम नहीं है।​निष्कर्ष: लोकतंत्र की अंतिम पुकारमीडिया अगर मर गया, तो लोकतंत्र भी मर जाएगा। आज की मीडिया वह दर्पण है जिसने खुद पर कालिख पोत ली है ताकि सत्ता की गंदगी उसमें न दिखे। इस किताब के माध्यम से मेरा उद्देश्य उस कालिख को हटाना है। मीडिया को वापस ‘जनता की अदालत’ बनना होगा, ‘नेताओं का दरबार’ नहीं।

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